श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.35.28 
तमनुप्लवते वायु: प्लवन्तं पुत्रमात्मन:।
सूर्यदाहभयाद् रक्षंस्तुषारचयशीतल:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
अपने पुत्र को सूर्य की ओर जाते देख, उसे जलने के भय से बचाने के लिए, उस समय वायुदेव भी बर्फ के ढेर के समान शीतल हो गए और उसके पीछे चलने लगे।
 
Seeing his son going towards the Sun, to protect him from the fear of burning, at that time even the Vayu Deva (Lord of Wind) became cool like a pile of snow and started following him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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