श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.35.22 
एष मातुर्वियोगाच्च क्षुधया च भृशार्दित:।
रुरोद शिशुरत्यर्थं शिशु: शरवणे यथा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
उस समय अपनी माता से वियोग में तथा अत्यन्त भूख से पीड़ित होकर बालक हनुमान उसी प्रकार जोर-जोर से रोने लगे, जैसे पूर्वकाल में सरकण्डों के वन में पुत्र कार्तिकेय रोये थे।
 
At that time, being separated from his mother and suffering from extreme hunger, the child Hanuman began to cry loudly in the same way as son Kartikeya had cried in the past inside the forest of reeds.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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