श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.35.18 
यदि वास्ति त्वभिप्राय: संश्रोतुं तव राघव।
समाधाय मतिं राम निशामय वदाम्यहम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! यदि हनुमान जी की कथा सुनने की आपकी हार्दिक इच्छा है, तो एकाग्रचित्त होकर सुनिए। मैं आपको सब कुछ बता रहा हूँ॥18॥
 
Raghunandan! If you have a heartfelt desire to hear the story of Hanuman ji, then listen with full concentration. I am telling you everything.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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