श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.35.16 
अमोघशापै: शापस्तु दत्तोऽस्य मुनिभि: पुरा।
न वेत्ता हि बलं सर्वं बली सन्नरिमर्दन॥ १६॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन रघुनन्दन! जिन ऋषियों का शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, उन्होंने पूर्वकाल में इन्हें शाप दिया था कि शक्ति होने पर भी इन्हें अपने पूर्ण बल का ज्ञान न होगा॥ 16॥
 
Shatrusudan Raghunandan! The sages whose curse never goes in vain had cursed him in the past that even though he had power, he would not be aware of his full strength.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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