vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 7: उत्तर काण्ड
»
सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना
»
श्लोक 10
श्लोक
7.35.10
हनूमान् यदि मे न स्याद् वानराधिपते: सखा।
प्रवृत्तिमपि को वेत्तुं जानक्या: शक्तिमान् भवेत्॥ १०॥
अनुवाद
यदि मुझे वानरराज सुग्रीव के मित्र हनुमान न मिलते, तो जानकी को कौन पा सकता था?॥10॥
If I had not found Hanuman, the friend of the monkey king Sugreeva, then who would have been able to find Janaki?॥ 10॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd