श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.35.1 
अपृच्छत तदा रामो दक्षिणाशाश्रयं मुनिम्।
प्राञ्जलिर्विनयोपेत इदमाह वचोऽर्थवत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
तब भगवान राम ने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा में रहने वाले अगस्त्य मुनि से नम्रतापूर्वक यह अर्थपूर्ण बात कही-॥1॥
 
Then with folded hands Lord Rama humbly spoke this meaningful thing to the sage Agastya who lived in the southern direction -॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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