श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 33: पुलस्त्यजी का रावण को अर्जुन की कैद से छुटकारा दिलाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  7.33.23 
तत: स राजा पिशिताशनानां
सहस्रबाहोरुपलभ्य मैत्रीम्।
पुनर्नृपाणां कदनं चकार
चकार सर्वां पृथिवीं च दर्पात्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
सहस्रबाहु की मित्रता पाकर राक्षसराज रावण पुनः अभिमान से भर गया और सारी पृथ्वी पर विचरण करके राजाओं का संहार करने लगा॥ 23॥
 
After receiving the friendship of Sahasrabahu, the king of demons Ravana once again became full of pride and started roaming all over the earth and killing kings.॥ 23॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयस्त्रिंश: सर्ग: ॥ ३ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ३॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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