श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 33: पुलस्त्यजी का रावण को अर्जुन की कैद से छुटकारा दिलाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.33.15 
भयाद् यस्योपतिष्ठेतां निष्पन्दौ सागरानिलौ।
सोऽयं मृधे त्वया बद्ध: पौत्रो मे रणदुर्जय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आपने मेरे उस वीर पौत्र को पकड़ लिया है, जो आपसे भयभीत है और जिसके कारण समुद्र और वायु भी अपनी बेचैनी त्यागकर आपकी सेवा के लिए आगे आते हैं॥ 15॥
 
You have captured my brave grandson, who is fearful of you and due to whom even the sea and wind abandon their restlessness and come forward to serve you.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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