श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 33: पुलस्त्यजी का रावण को अर्जुन की कैद से छुटकारा दिलाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.33.10 
अद्यैवममरावत्या तुल्या माहिष्मती कृता।
अद्याहं तु द्विजेन्द्र त्वां यस्मात् पश्यामि दुर्दृशम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
द्विजेन्द्र! आपके दर्शन अत्यंत दुर्लभ हैं, फिर भी आज मैं आपके दर्शन का आनंद ले रहा हूँ। इस प्रकार यहाँ आकर आपने इस माहिष्मतीपुरी को अमरावतीपुरी के समान शोभायमान बना दिया है॥10॥
 
‘Dwijendra! It is extremely rare to see you, yet today I am enjoying your sight. By coming here in this manner you have made this Mahishmatipuri as glorious as Amaravatipuri.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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