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श्लोक 7.32.73  |
स कीर्यमाण: कुसुमाक्षतोत्करै-
र्द्विजै: सपौरै: पुरुहूतसंनिभ:।
ततोऽर्जुन: स्वां प्रविवेश तां पुरीं
बलिं निगृह्येव सहस्रलोचन:॥ ७३॥ |
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| अनुवाद |
| नगर के निकट पहुँचकर ब्राह्मणों और नगरवासियों ने अपने राजा पर, जो इन्द्र के समान तेजस्वी थे, पुष्प और चावल की वर्षा की। और जिस प्रकार सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने बलि को बंदी बना लिया था, उसी प्रकार राजा अर्जुन ने बन्धे हुए रावण को साथ लेकर अपने नगर में प्रवेश किया।' |
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| On approaching the city, the Brahmins and the citizens of the city showered flowers and rice grains on their king who was as illustrious as Indra. And just as the thousand-eyed Indra had taken Bali captive, in the same manner King Arjuna entered his city with the bound Ravana along with him.' |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग: ॥ ३ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ २॥ |
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