श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.31.5 
राघवस्य वच: श्रुत्वा अगस्त्यो भगवानृषि:।
उवाच रामं प्रहसन् पितामह इवेश्वरम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्री राम के ये शब्द सुनकर अगस्त्य ऋषि जोर से हंसे और श्री राम से ऐसे बोले जैसे भगवान ब्रह्मा भगवान महादेव से कुछ कह रहे हों।
 
On hearing these words of Shri Rama, the sage Agastya laughed out loud and spoke to Shri Rama just as Lord Brahma was saying something to Lord Mahadev.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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