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श्लोक 7.31.44  |
तत: सतामार्तिहरं परं वरं
वरप्रदं चन्द्रमयूखभूषणम्।
समर्चयित्वा स निशाचरो जगौ
प्रसार्य हस्तान् प्रणनर्त चाग्रत:॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| चन्द्रमा की किरणों को अपने मस्तक पर धारण करने वाले, पुण्यात्माओं के दुःखों को दूर करने वाले और अपने भक्तों को मनोवांछित वर देने वाले महान् एवं श्रेष्ठ देवता भगवान शंकर की भलीभाँति पूजा करके वह रात्रि-मृग उनके सामने हाथ फैलाकर गाने और नाचने लगा॥ 44॥ |
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| After thoroughly worshipping Lord Shankar, the great and excellent deity who wears the rays of the moon as ornaments on his forehead, takes away the pains of the virtuous and grants the desired boons to his devotees, that night-deer began to sing and dance before him with his hands outstretched.॥ 44॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकत्रिंश: सर्ग: ॥ ३ १॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ १॥ |
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