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ramayan 7.31.2: हे प्रभु! द्विजश्रेष्ठ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वी को जीतता हुआ पृथ्वी पर विचरण कर रहा था, तब क्या यहाँ के सभी लोग वीर गुणों से रहित थे?   |   ramayan सर्ग 7.31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.31.2 
भगवन् राक्षस: क्रूरो यदाप्रभृति मेदिनीम्।
पर्यटत् किं तदा लोका: शून्या आसन् द्विजोत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! द्विजश्रेष्ठ! जब क्रूर निशाचर रावण पृथ्वी को जीतता हुआ पृथ्वी पर विचरण कर रहा था, तब क्या यहाँ के सभी लोग वीर गुणों से रहित थे?
 
Lord! Dwijshreshtha! When the cruel nocturnal Ravana was roaming around the earth conquering the earth, were all the people here devoid of heroic qualities?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)