श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.30.6 
बलवान् दुर्जयश्चैव भविष्यत्येव राक्षस:।
यं समाश्रित्य ते राजन् स्थापितास्त्रिदशा वशे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! यह राक्षस अवश्य ही बड़ा बलवान और दुर्जय है। इसकी शरण लेकर आपने समस्त देवताओं को अपने वश में कर लिया है।॥6॥
 
O King! This demon must be very powerful and difficult to defeat. By taking shelter of him you have brought all the gods under your control. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)