|
| |
| |
श्लोक 7.30.39-40  |
तदाप्रभृति भूयिष्ठं प्रजा रूपसमन्विता।
सा तं प्रसादयामास महर्षिं गौतमं तदा॥ ३९॥
अज्ञानाद् धर्षिता विप्र त्वद्रूपेण दिवौकसा।
न कामकाराद् विप्रर्षे प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ ४०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| 'तब से अधिकांश लोग सुन्दर होने लगे। उस समय अहिल्या ने अपने विनीत वचनों से महर्षि गौतम को प्रसन्न करके कहा - 'विप्रवर! ब्रह्मर्षि! देवराज ने आपका रूप धारण करके मेरा अपमान किया है। मैं उन्हें पहचान न सकी। अतः मैंने स्वेच्छा से नहीं, बल्कि अनजाने में ही यह अपराध किया है। अतः आप मुझ पर दया करें।'॥39-40॥ |
| |
| ‘Since then most of the people started becoming beautiful. At that time Ahalya pleased Maharishi Gautam with her polite words and said – ‘Vipravar! Brahmarshi! Devraj has defamed me by assuming your form. I could not recognize him. Hence I have committed this crime unknowingly, not out of self-will. Therefore you should be merciful to me.’॥ 39-40॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|