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श्लोक 7.30.32  |
यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात्।
तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| 'उसने तुम्हें शाप दिया था कि, 'वासव! शक्र! तुमने निर्भय होकर मेरी पत्नी के साथ बलात्कार किया है; इसलिए जब तुम युद्ध में जाओगे तो शत्रुओं के हाथों में पड़ोगे।' |
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| ‘He cursed you saying, ‘Vaasava! Sakra! You have fearlessly raped my wife; therefore when you go to war you will fall into the hands of the enemy. |
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