श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.30.31 
तत: क्रुद्धेन तेनासि शप्त: परमतेजसा।
गतोऽसि येन देवेन्द्र दशाभागविपर्ययम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
देवेन्द्र! इससे वे परम तेजस्वी ऋषि अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया। उसी शाप के कारण तुम्हें यह विकट परिस्थिति प्राप्त हुई है - शत्रु का बंदी बनना पड़ा है।
 
Devendra! This made that extremely illustrious sage very angry and he cursed you. Due to that curse you have had to come into this adverse condition - you have had to become a prisoner of the enemy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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