श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  7.30.27 
ततस्तस्य परिज्ञाय महास्थैर्यं महामुने:।
ज्ञात्वा तपसि सिद्धिं च पत्न्यर्थं स्पर्शिता तदा॥ २७॥
 
 
अनुवाद
महर्षि गौतम की महान स्थिरता (इन्द्रियों का संयम) और तपसम्बन्धी सिद्धि को जानकर मैंने पुनः उस कन्या को उन्हें पत्नी रूप में दे दिया॥27॥
 
Knowing the great steadiness (control of senses) and the penance-related accomplishments of the great sage Gautam, I again gave that girl to him as my wife. 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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