श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  7.30.26 
सा मया न्यासभूता तु गौतमस्य महात्मन:।
न्यस्ता बहूनि वर्षाणि तेन निर्यातिता च ह॥ २६॥
 
 
अनुवाद
मैंने उस कन्या को महर्षि गौतम को जमानत के रूप में सौंप दिया। वह अनेक वर्षों तक उनके पास रही। फिर गौतम ने उसे मुझे लौटा दिया॥ 26॥
 
I handed over the girl as a deposit to Maharshi Gautam. She stayed with him for many years. Then Gautam returned her to me.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)