श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  7.30.20 
तासां नास्ति विशेषो हि दर्शने लक्षणेऽपि वा।
ततोऽहमेकाग्रमनास्ता: प्रजा: समचिन्तयम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उनके रंग-रूप में कोई अंतर नहीं था। फिर मैंने इन प्रजातियों की कुछ खास विशेषताओं के बारे में सोचने पर ध्यान केंद्रित किया।
 
‘There was no difference in their appearance and colour. Then I concentrated on thinking about some special features of these species.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)