श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.30.17 
एतस्मिन्नन्तरे राम दीनो भ्रष्टामरद्युति:।
इन्द्रश्चिन्तापरीतात्मा ध्यानतत्परतां गत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
श्री राम! उस समय इन्द्र का दिव्य तेज नष्ट हो चुका था। वे दुःखी और चिन्तित होकर अपनी पराजय का कारण सोचने लगे।
 
Shri Ram! At that time Indra's divine glory had been destroyed. He became sad and worried and started thinking about the reason for his defeat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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