श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.30.16 
एवमस्त्विति तं चाह वाक्यं देव: पितामह:।
मुक्तश्चेन्द्रजिता शक्रो गताश्च त्रिदिवं सुरा:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा - ‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’। इसके बाद इन्द्रजित ने इन्द्र को मुक्त कर दिया और सभी देवता उसे साथ लेकर स्वर्गलोक को चले गए॥16॥
 
Hearing this, Lord Brahma said – 'Evamastu (may it be so)'. After this, Indrajit freed Indra and all the gods took him along with him and went to heaven. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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