श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 11-13
 
 
श्लोक  7.30.11-13 
श्रूयतां या भवेत् सिद्धि: शतक्रतुविमोक्षणे॥ ११॥
ममेष्टं नित्यशो हव्यैर्मन्त्रै: सम्पूज्य पावकम्।
संग्राममवतर्तुं च शत्रुनिर्जयकाङ्क्षिण:॥ १२॥
अश्वयुक्तो रथो मह्यमुत्तिष्ठेत् तु विभावसो:।
तत्स्थस्यामरता स्यान्मे एष मे निश्चितो वर:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! (यदि पूर्ण अमरत्व प्राप्त करना असम्भव हो) तो इन्द्र को मुक्त करने के लिए मेरी दूसरी शर्त सुनिए, वह दूसरी सिद्धि जो मैं प्राप्त करना चाहता हूँ। मेरे लिए यह सदा का नियम हो कि जब मैं शत्रु पर विजय पाने की इच्छा से युद्ध में उतरूँ और मन्त्रों से आहुति देकर अग्निदेव की पूजा करूँ, तब अग्नि में से मेरे लिए घोड़ों से जुता हुआ एक रथ प्रकट हो और जब तक मैं उस पर बैठा रहूँ, तब तक कोई मुझे मार न सके, यह मेरा निश्चित वर है।।11-13।।
 
Lord! (If it is impossible to attain immortality completely) then listen to my second condition for releasing Indra, the second siddhi which I want to attain. Let it be a rule for me forever that when I want to enter the battle with the desire to conquer the enemy and worship Agnidev by offering oblations with mantras, then a chariot drawn by horses should appear for me from the fire and as long as I am sitting on it, no one should be able to kill me, this is my sure boon. 11-13.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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