श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 3: राक्षस वंश का वर्णन - हेति, विद्युत्केश और सुकेश की उत्पत्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.3.2 
सत्यवान् शीलवान् दान्त: स्वाध्यायनिरत: शुचि:।
सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यं धर्मपरायण:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वह सत्यवादी, सदाचारी, बुद्धिमान, स्वाध्यायशील, भीतर-बाहर से शुद्ध, समस्त सुखों से अनासक्त और सदैव धर्म में तत्पर रहने वाला था॥2॥
 
He was truthful, virtuous, intelligent, devoted to self-study, pure from within and outside, unattached to all pleasures and always engaged in religion. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)