श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 29: रावण का देवसेना के बीच से होकर निकलना, देवताओं का उसे कैद करने के लिये प्रयत्न, मेघनाद का माया द्वारा इन्द्र को बन्दी बनाना तथा विजयी होकर सेना सहित लङ्का को लौटना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.29.15 
नह्येष हन्तुं शक्योऽद्य वरदानात् सुनिर्भय:।
तद् ग्रहीष्यामहे रक्षो यत्ता भवत संयुगे॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आज इसका वध नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्माजी के वरदान से यह पूर्णतः निर्भय हो गया है। अतः हम इस राक्षस को पकड़कर कारागार में डाल देंगे। तुम लोग युद्ध में इसके लिए पूर्ण प्रयत्न करो॥ 15॥
 
He cannot be killed today because he has become completely fearless due to the boon of Brahmaji. Therefore, we will capture this demon and imprison him. You all should make full efforts for this in the war.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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