श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  7.25.43-44h 
सत्यवाग् भव राजेन्द्र मामवेक्षस्व याचतीम्॥ ४३॥
त्वयाप्युक्तं महाराज न भेतव्यमिति स्वयम्।
 
 
अनुवाद
'राजेन्द्र! तुम सत्यवादी हो - अपना वचन निभाओ। मैं तुमसे अपने पति के प्राणों की भीख माँगती हूँ, मेरी दुःखी बहन की ओर दृष्टि डालो, मुझ पर दया करो। महाराज! तुमने ही मुझे आश्वासन दिया था कि 'डरो मत।' अतः अपना वचन निभाओ।'
 
‘Rajendra! You are truthful – keep your word. I beg you for my husband's life, please look at me, my distressed sister, have mercy on me. Maharaj! You yourself had assured me saying, 'Don't be afraid.' So keep your word.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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