श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 31-33h
 
 
श्लोक  7.25.31-33h 
कल्प्यतां मे रथ: शीघ्रं शूरा: सज्जीभवन्तु न:।
भ्राता मे कुम्भकर्णश्च ये च मुख्या निशाचरा:॥ ३१॥
वाहनान्यधिरोहन्तु नानाप्रहरणायुधा:।
अद्य तं समरे हत्वा मधुं रावणनिर्भयम्॥ ३२॥
सुरलोकं गमिष्यामि युद्धाकाङ्क्षी सुहृद‍्वृत:।
 
 
अनुवाद
मेरा रथ शीघ्रता से जुतवाकर उसमें आवश्यक साज-सामान भर दिया जाए। मेरे वीर सैनिक युद्ध यात्रा के लिए तैयार हो जाएँ। मेरे भाई कुंभकर्ण तथा अन्य प्रमुख राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर रथों पर विराजमान हों। आज मैं युद्धभूमि में रावण से न डरने वाले मधु का वध करके अपने मित्रों सहित युद्ध करने की इच्छा से देवलोक की यात्रा करूँगा।'
 
My chariot should be quickly harnessed and equipped with all the necessary equipment. My valiant soldiers should be ready for the battle journey. My brother Kumbhakarna and other prominent demons should be seated on the chariots, equipped with various types of weapons. Today, after killing Madhu, who did not fear Ravana, in the battlefield, I will travel to Devlok with the desire to fight along with my friends.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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