श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  7.25.29-30 
विभीषणवच: श्रुत्वा राक्षसेन्द्र: स रावण:॥ २९॥
दौरात्म्येनात्मनोद्‍धूतस्तप्ताम्भा इव सागर:।
ततोऽब्रवीद् दशग्रीव: क्रुद्ध: संरक्तलोचन:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
विभीषण के ये वचन सुनकर राक्षसराज रावण अपने पापकर्मों से संतप्त होकर गर्म जल से भरे समुद्र के समान व्याकुल हो गया। वह क्रोध से जलने लगा और उसके नेत्र लाल हो गए। उसने कहा—॥29-30॥
 
Hearing these words of Vibhishan, the demon king Ravana, tormented by his evil deeds, became as agitated as the sea with hot water. He started burning with anger and his eyes became red. He said—॥29-30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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