श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 25: यज्ञों द्वारा मेघनाद की सफलता, विभीषण का रावण को पर-स्त्री-हरण के दोष बताना, कुम्भीनसी को आश्वासन दे मधु को साथ ले रावण का देवलोक पर आक्रमण करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.25.17 
लक्षिण्यो रत्नभूताश्च देवदानवरक्षसाम्।
तस्य तासु मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह उत्तम रूपवाली थी और देवताओं, दानवों और राक्षसों के घराने की मणि थी। रावण की उनमें आसक्ति जानकर धर्मात्मा विभीषण ने कहा- 17॥
 
She was adorned with excellent features and was the gem of the house of gods, demons and rakshasas. Knowing about Ravana's attachment to them, the virtuous Vibhishan said - 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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