श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 24: रावण द्वारा अपहृत हुई देवता आदि की कन्याओं और स्त्रियों का विलाप एवं शाप, रावण का रोती हुई शूर्पणखा को आश्वासन देना और उसे खर के साथ दण्डकारण्य में भेजना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  7.24.30-31h 
ननु नाम त्वया रक्ष्यो जामाता समरेष्वपि॥ ३०॥
स त्वया निहतो युद्धे स्वयमेव न लज्जसे।
 
 
अनुवाद
भैया! आप मेरे पिता के समान हैं। मेरे पति आपके दामाद थे। क्या आपको युद्ध में अपने दामाद या देवर की रक्षा नहीं करनी चाहिए थी? आपने स्वयं युद्ध में अपने दामाद को मार डाला; क्या अब भी आपको लज्जा नहीं आती?॥30 1/2॥
 
‘Brother! You are like my father. My husband was your son-in-law, shouldn’t you have protected your son-in-law or brother-in-law in the war? You yourself killed your son-in-law in the war; are you still not ashamed?’॥ 30 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas