श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 23: रावण के द्वारा निवातकवचों से मैत्री, कालकेयों का वध तथा वरुणपुत्रों की पराजय  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  7.23.54 
आगतस्तु पथा येन तेनैव विनिवृत्य स:।
लङ्कामभिमुखो रक्षो नभस्तलगतो ययौ॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वह जिस मार्ग से आया था उसी मार्ग से वापस लौटा और आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ा।
 
He returned by the same route by which he had come and proceeded towards Lanka through the sky route.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रयोविंश: सर्ग: ॥ २ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तेईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ३॥
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd