श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 23: रावण के द्वारा निवातकवचों से मैत्री, कालकेयों का वध तथा वरुणपुत्रों की पराजय  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.23.25 
ततो धाराशताकीर्णं शारदाभ्रनिभं तदा।
नित्यप्रहृष्टं ददृशे वरुणस्य गृहोत्तमम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ जाकर उसने वरुण का सुन्दर महल देखा, जो सदैव आनन्दोत्सवों से भरा रहता था, अनेक जलधाराओं (झरनों) से भरा हुआ था और शरद ऋतु के मेघों के समान चमकीला था॥25॥
 
Entering there, he saw the beautiful palace of Varuna, which was always full of joyous celebrations, filled with many water streams (fountains) and as bright as the autumn clouds. 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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