Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 7.20.29-31h: जो जीवों के दान और कर्मों का साक्षी है, जिसका तेज द्वितीय अग्नि के समान है, जिससे समस्त जीव चेतना प्राप्त करते हैं और नाना प्रकार के कर्म करते हैं, जिससे तीनों लोकों के प्राणी भयभीत होकर भागते हैं, उसके पास यह दैत्यराज कैसे जा सकता है?॥29-30 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.20: नारदजी का रावण को समझाना, उनके कहने से रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषयमें विचार करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 20: नारदजी का रावण को समझाना, उनके कहने से रावण का युद्ध के लिये यमलोक को जाना तथा नारदजी का इस युद्ध के विषयमें विचार करना  »  श्लोक 29-31h
 
 
श्लोक  7.20.29-31h 
स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावक:॥ २९॥
लब्धसंज्ञा विचेष्टन्ते लोका यस्य महात्मन:।
यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयार्दिता:॥ ३०॥
तं कथं राक्षसेन्द्रोऽसौ स्वयमेव गमिष्यति।
 
 
अनुवाद
जो जीवों के दान और कर्मों का साक्षी है, जिसका तेज द्वितीय अग्नि के समान है, जिससे समस्त जीव चेतना प्राप्त करते हैं और नाना प्रकार के कर्म करते हैं, जिससे तीनों लोकों के प्राणी भयभीत होकर भागते हैं, उसके पास यह दैत्यराज कैसे जा सकता है?॥29-30 1/2॥
 
How can this King of Demons go to the One who is the witness of the gifts and deeds of the living beings, whose brilliance is like that of a second fire, from whom all living beings derive consciousness and perform various activities, from whom the creatures of the three worlds run away in fear?॥ 29-30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)