श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 2: महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्य के गुण और तपस्या का वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनि की उत्पत्ति का कथन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.2.34 
श्रुतिमान् समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा।
पितेव तपसा युक्तो ह्यभवद् विश्रवा मुनि:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
‘विश्रवा मुनि वेदों के विद्वान, दूरदर्शी, व्रत और आचार के पालनकर्ता तथा अपने पिता के समान तपस्वी थे।’ 34॥
 
‘Vishrava Muni was a scholar of the Vedas, a visionary, an observer of fasts and conduct, and an ascetic like his father.’ 34॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्वितीय: सर्ग: ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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