श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 2: महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्य के गुण और तपस्या का वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनि की उत्पत्ति का कथन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.2.28 
दत्त्वा तु तनयां राजा स्वमाश्रमपदं गत:।
सापि तत्रावसत् कन्या तोषयन्ती पतिं गुणै:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् राजा तृणबिन्दु अपनी कन्या को उन महर्षि को देकर अपने आश्रम में लौट आये और वह कन्या अपने सद्गुणों से अपने पति को संतुष्ट करती हुई वहीं रहने लगी॥ 28॥
 
‘Then, after giving his daughter to that great sage, King Trinabindu returned to his hermitage, and the daughter continued to live there, satisfying her husband with her virtues.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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