श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 2: महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्य के गुण और तपस्या का वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनि की उत्पत्ति का कथन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  7.2.23 
तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभ:।
ध्यानं विवेश तच्चापि अपश्यदृषिकर्मजम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
राजर्षि तृणबिन्दु अपनी तपस्या से चमक रहे थे। जब उन्होंने ध्यान किया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब महर्षि पुलस्त्य के कारण ही हुआ है।॥23॥
 
‘Rajarshi Trinabindu was shining with his penance. When he meditated, he realized that all this had happened because of Maharishi Pulasty.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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