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ramayan 7.2.21: ‘अभी कुछ समय पहले मैं अपने मित्रों को ढूँढ़ने के लिए शुद्धहृदय महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम में अकेला गया था।॥ 21॥   |   ramayan सर्ग 7.2: महर्षि अगस्त्य के द्वारा पुलस्त्य के गुण और तपस्या का वर्णन तथा उनसे विश्रवा मुनि की उत्पत्ति का कथन   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.2.21 
किं तु पूर्वं गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मन:।
पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टुं स्वसखीजनम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘अभी कुछ समय पहले मैं अपने मित्रों को ढूँढ़ने के लिए शुद्धहृदय महर्षि पुलस्त्य के दिव्य आश्रम में अकेला गया था।॥ 21॥
 
‘Just a little while ago I had gone alone to the divine hermitage of the pure-hearted Maharishi Pulastya to look for my friends.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)