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श्लोक 7.2.10  |
सर्वर्तुषूपभोग्यत्वाद् रम्यत्वात् काननस्य च।
नित्यशस्तास्तु तं देशं गत्वा क्रीडन्ति कन्यका:॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ का वन सब ऋतुओं में आनन्ददायक और सुन्दर था, इसलिए कन्याएँ प्रतिदिन वहाँ जाकर नाना प्रकार के खेल खेलती थीं॥10॥ |
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| The forest there was enjoyable in all seasons and was beautiful, so the girls used to go there every day and play various kinds of games.॥ 10॥ |
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