श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 17: रावण से तिरस्कृत ब्रह्मर्षि कन्या वेदवती का उसे शाप देकर अग्नि में प्रवेश करना और दूसरे जन्म में सीता के रूप में प्रादुर्भूत होना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  7.17.42 
एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुन:।
क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यह महाभागा देवी रावण के वध के उद्देश्य से पुनः भिन्न-भिन्न कल्पों में मृत्युलोक में अवतार लेती रहेंगी। यह हल से जोते हुए खेत में यज्ञवेदी पर अग्नि की ज्वाला के समान प्रकट हुई हैं। 42॥
 
In this way, this Mahabhaga Devi will keep incarnating in the mortal world again in different Kalpas for the purpose of killing Ravana. It has appeared in the field plowed with a plow like a flame of fire on the sacrificial altar. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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