श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 15: माणिभद्र तथा कुबेर की पराजय और रावण द्वारा पुष्पक विमान का अपहरण  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  7.15.38-39h 
काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम्॥ ३८॥
मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकालफलद्रुमम्।
 
 
अनुवाद
उस विमान में सोने के स्तम्भ और लाजवर्द के द्वार थे। वह चारों ओर से मोतियों के जाल से ढका हुआ था। उसके अन्दर ऐसे वृक्ष लगे थे जो हर ऋतु में फल देते थे।
 
That plane had pillars of gold and gates of lapis lazuli. It was covered with a net of pearls from all sides. Inside it were planted such trees that bore fruits in all seasons. 38 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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