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श्लोक 7.15.25  |
कस्यचिन्न हि दुर्बुद्धेश्छन्दतो जायते मति:।
यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| ‘दुर्बुद्धि वाला कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा से (अच्छे कर्म किए बिना और अपने बड़ों की सेवा किए बिना) सद्बुद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। वह अपने कर्मों का फल भोगता है।॥25॥ |
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| ‘No person with bad intellect can attain good intellect by his own will (without performing good deeds and serving his elders). He reaps the fruits of his deeds.॥ 25॥ |
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