श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 14: मन्त्रियों सहित रावण का यक्षों पर आक्रमण और उनकी पराजय  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.14.13 
न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रै: समाहत:।
महीधर इवाम्भोदैर्धाराशतसमुक्षित:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यक्षों के अस्त्र-शस्त्रों से आहत होने पर भी वह दुःखी नहीं हुआ; जैसे बादलों द्वारा बरसाई गई सैकड़ों जल धाराओं से अभिषिक्त होने पर भी पर्वत अविचलित रहता है ॥13॥
 
Even though he was struck by the weapons of the Yakshas, ​​he did not feel sad; just like a mountain remains unmoved even when it is anointed with hundreds of streams of water poured by the clouds. ॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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