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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  7.13.36-37 
नैवेदं क्षमणीयं मे यदेतद् भाषितं त्वया॥ ३६॥
यदेतावन्मया कालं दूत तस्य तु मर्षितम्।
न हन्तव्यो गुरुर्ज्येष्ठो मयायमिति मन्यते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'दूत! आपने जो कुछ कहा है, वह मेरे लिए असहनीय है। कुबेर मेरे बड़े भाई हैं, इसलिए उनका वध करना उचित नहीं है - ऐसा सोचकर मैंने आज तक उन्हें क्षमा किया है।
 
‘Messenger! What you have said here is not tolerable for me. Kubera is my elder brother, therefore it is not right to kill him - thinking this, I have forgiven him till today.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)