श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  7.13.3-4 
विनियुक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत्।
विस्तीर्णं योजनं स्निग्धं ततो द्विगुणमायतम्॥ ३॥
दर्शनीयं निराबाधं कुम्भकर्णस्य चक्रिरे।
स्फाटिकै: काञ्चनैश्चित्रै: स्तम्भै: सर्वत्र शोभितम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर दैत्यराज ने विश्वकर्मा आदि योग्य शिल्पियों को एक भवन बनाने का आदेश दिया। उन शिल्पियों ने दो योजन लम्बा और एक योजन चौड़ा एक चिकना भवन बनाया, जो देखने योग्य था। उसमें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं थी। चारों ओर स्फटिक और स्वर्ण से बने स्तम्भ लगे थे, जो उस भवन की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
On hearing this, the demon king ordered capable craftsmen like Vishwakarma to build a house. Those craftsmen built a smooth house two yojanas long and one yojana wide, which was worth seeing. There was no obstruction of any kind in it. There were pillars made of crystal and gold everywhere, which were enhancing the beauty of that building. 3-4.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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