श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.13.28 
तृतीय: पुरुषो नास्ति यश्चरेद् व्रतमीदृशम्।
व्रतं सुदुष्करं ह्येतन्मयैवोत्पादितं पुरा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तीसरी बात, ऐसा कठिन व्रत करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। मैंने ही पूर्वकाल में इस अत्यन्त कठिन व्रत को प्रकट किया था॥28॥
 
‘Thirdly, there is no other person who can follow such a tough vow. I myself had revealed this extremely difficult vow in the past.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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