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ramayan 7.13.27: हे धर्म के ज्ञाता और उत्तम व्रत का पालन करने वाले धनेश्वर! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त संतुष्ट हूँ। एक तो मैंने यह व्रत किया है और दूसरे तुमने किया है॥ 27॥   |   ramayan सर्ग 7.13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  7.13.27 
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसानेन सुव्रत।
मया चैतद् व्रतं चीर्णं त्वया चैव धनाधिप॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म के ज्ञाता और उत्तम व्रत का पालन करने वाले धनेश्वर! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त संतुष्ट हूँ। एक तो मैंने यह व्रत किया है और दूसरे तुमने किया है॥ 27॥
 
O Dhaneshwar, the knower of Dharma and the one who observes the best fast, I am very satisfied with your penance. Firstly, I have observed this fast and secondly, you have.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)