श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  7.13.25 
ततोऽहमन्यद् विस्तीर्णं गत्वा तस्य गिरेस्तटम्।
तूष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समधारं महाव्रतम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'इसके बाद मैं पर्वत के दूसरे चौड़े तट पर गया और आठ सौ वर्षों तक मौन रहकर उस महान व्रत का पालन किया।
 
‘Thereafter I went to the other broad bank of the mountain and observed that great vow in silence for eight hundred years.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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