श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  7.13.20 
निराकृतश्च बहुशस्त्वयाहं राक्षसाधिप।
सापराधोऽपि बालो हि रक्षितव्य: स्वबान्धवै:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
‘राक्षसराज! आपने भी अनेक बार मेरा अपमान किया है; तथापि यदि कोई बालक अपराध भी करे, तो भी उसके बन्धु-बान्धवों को उसकी रक्षा करनी चाहिए (इसीलिए मैं आपको हितकर उपदेश दे रहा हूँ)॥20॥
 
‘King of demons! You have also insulted me many times; However, even if a child commits a crime, his relatives should still protect him (that is why I am giving you beneficial advice). 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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