श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.13.10 
नदीं गज इव क्रीडन् वृक्षान् वायुरिव क्षिपन्।
नगान् वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षस:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वह राक्षस हाथी के समान नदी में क्रीड़ा करता और उसकी धारा को तोड़ता था। वह वायु के समान वृक्षों को हिलाकर उखाड़ देता था और इन्द्र के हाथ से छूटे हुए वज्र के समान पर्वतों को तोड़ डालता था।॥10॥
 
That demon used to play in the river like an elephant and break its currents. He used to uproot the trees by shaking them like the wind and used to break the mountains like a thunderbolt released from the hand of Indra.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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