श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 13: रावण द्वारा बनवाये गये शयनागार में कुम्भकर्ण का सोना, रावण का अत्याचार, कुबेर का दूत भेजकर उसे समझाना तथा कुपित हुए रावण का उस दूत को मार डालना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.13.1 
अथ लोकेश्वरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित्।
निद्रा समभवत् तीव्रा कुम्भकर्णस्य रूपिणी॥ १॥
 
 
अनुवाद
(अगस्त्य कहते हैं - रघुनन्दन!) तत्पश्चात, कुछ समय पश्चात् जगत के स्वामी भगवान ब्रह्मा द्वारा भेजी हुई निद्रा, जम्हाई आदि के रूप में, बड़े वेग से कुम्भकर्ण के अन्दर प्रकट हुई॥1॥
 
(Agastya says - Raghunandan!) Thereafter, after some time, the sleep sent by Lord Brahma, the lord of the world, in the form of yawns etc. appeared inside Kumbhakarna with great force. ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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